कृषि मंत्री शिवराज के गृह क्षेत्र का कृषक संगोष्ठी भवन बना अमीरों का निशुल्क अड्डा?ओर गरीब,किसान पर तीन हजार का बोझ
देश के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृह क्षेत्र में किसानों के लिए करोड़ों की लागत से बना कृषक संगोष्ठी भवन अब विवादों के घेरे में है।यह भवन,जो किसानों की बैठकें,प्रशिक्षण और कृषि विकास कार्यक्रमों के लिए बनाया गया था,आज अमीरों के लिए मुफ़्त ठिकाना और गरीब किसानों के लिए महँगा बोझ बन गया है।
अमीरों को मुफ़्त,गरीबों से वसूली
स्थानीय लोगों का कहना है कि भवन का निर्माण इस मकसद से हुआ था कि किसान अपनी समस्याओं पर चर्चा कर सकें और कृषि से जुड़ी गतिविधियाँ कर सकें।लेकिन हकीकत उलट है,यहाँ बड़े ठेकेदारों,व्यापारियों और संपन्न वर्ग के सामाजिक कार्यक्रम बिना शुल्क हो रहे हैं,जबकि असली किसान या गरीब यदि इसका उपयोग करना चाहें तो नगर परिषद द्वारा उनसे सीधे तीन हजार रुपये की फीस वसूली जाती है।एक किसान ने सवाल उठाया कि
प्रशासन पर सवाल
किसानों का आरोप है कि भवन प्रबंधन पर अधिकारियों और नेताओं का दबाव है।सरकारी फंड से बने इस भवन में गरीब किसानों से शुल्क वसूलना सीधे-सीधे पक्षपात और असमानता की कहानी कहता है।
नाराजगी और अविश्वास
किसानों में इस मामले को लेकर गहरी नाराजगी है।उनका कहना है कि यदि भवन का उपयोग मुफ़्त है,तो सबसे पहले यह अधिकार किसानों को मिलना चाहिए।सरकार को स्पष्ट करना होगा कि यह भवन अमीरों का हॉल है या किसानों का संगोष्ठी भवन।
शिवराज का दोहरा सच
शिवराज मंच से कहते हैं गरीब मेरा भगवान है। लेकिन जमीन पर भगवान यानी गरीब किसान को ही तीन हजार रुपये की टिकट कटाकर प्रवेश मिल रहा है।
बड़ा सवाल
सालों तक क्षेत्र के विधायक और मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान की पहचान जनता के बीच मामा के रूप में रही,जिन्होंने बराबरी और सेवा को राजनीति का आधार बनाया।लेकिन आज उनके गृह क्षेत्र में प्रशासन और कुछ नेता किस अधिकार से किसानों और गरीबों के साथ भेदभाव कर रहे हैं।जनता पूछ रही है,जब शिवराज ने मुख्यमंत्री रहते कभी भेदभाव नहीं किया,तो स्थानीय अधिकारियों और नेताओं को यह हिम्मत आखिर किसने दी।
किसानों के नाम पर बने भवन का असली मालिक कौन किसान या अमीर।
यह मामला अब केवल भवन के उपयोग का नहीं, बल्कि व्यवस्था के चरित्र का सवाल बन गया है।अब देखना हैं कि खबर के बाद अन्नदाता को न्याय मिलेगा,या फिर व्यवस्था किसी सफेदपोश के इशारे पर ही चलती रहेगी






